New Delhi: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक संस्कृत वैदिक मंत्र साझा किया। शुक्ल यजुर्वेद संहिता के 36वें अध्याय के 10वें मंत्र में वायु, सूर्य और वर्षा से सुख, शांति और कल्याण की कामना की गई है. पीएम मोदी ने इस मंत्र के जरिए प्रकृति और मानव जीवन के बीच गहरे संबंध की ओर ध्यान आकर्षित किया।
पीएम मोदी ने इस मंत्र साझा करते हुए लिखा कि शं नो वातः पवतां शं नस्तपतु सूर्यः। शं नः कनिक्रदद् देवः पर्जन्योऽभिवर्षतु॥ इस वैदिक मंत्र का भावार्थ है कि वायु हमारे लिए सुखद, शुद्ध और कल्याणकारी होकर बहे. सूर्य का ताप भी जीवन के लिए अनुकूल रहे और पर्जन्य देव समय पर ऐसी वर्षा करें, जिससे धरती और मानव जीवन सुखी रहे।
प्रकृति के संतुलन और कल्याण की प्रार्थना
बता दें कि यह मंत्र वाजसनेयी संहिता यानी शुक्ल यजुर्वेद का हिस्सा है. इसमें प्रकृति, मनुष्य और पूरे ब्रह्मांड के बीच संतुलन और कल्याण की भावना दिखाई देती है. वैदिक परंपरा में प्रकृति को जीवन का मूल आधार माना गया है. वायु, सूर्य और जल मानव जीवन के साथ-साथ पेड़-पौधों और कृषि के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं. मंत्र में इन्हीं प्राकृतिक शक्तियों के अनुकूल और कल्याणकारी बने रहने की कामना की गई है. इसमें प्रकृति से सुखद हवा, अनुकूल धूप और समय पर बारिश मिलने की प्रार्थना की गई है।
वायु, सूर्य और वर्षा का जीवन में महत्व
वायु केवल सांस लेने के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के पूरे चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इसी तरह सूर्य पृथ्वी को ऊर्जा देता है और पेड़-पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के लिए आवश्यक है. वर्षा का सीधा संबंध खेती और जलस्रोतों से है. समय पर पर्याप्त बारिश होने से फसलों को पानी मिलता है और नदियों, तालाबों तथा भूजल स्रोतों को भी मदद मिलती है. इसके विपरीत बारिश की कमी से सूखे और कृषि संकट जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं।
खेती और मानव जीवन से जुड़ा है मंत्र
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बारिश का महत्व और भी बढ़ जाता है. किसानों की फसल काफी हद तक समय पर होने वाली वर्षा पर निर्भर रहती है. यही वजह है कि वैदिक काल में भी वर्षा और प्राकृतिक शक्तियों को जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया. पीएम मोदी द्वारा साझा किए गए इस मंत्र में भी प्रकृति की इन्हीं शक्तियों से अनुकूल परिस्थितियां बनाए रखने की प्रार्थना की गई है. आधुनिक दौर में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों के बीच यह वैदिक संदेश प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलने की जरूरत की ओर ध्यान दिलाता है।