Death Zone: दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों पर पहुंचना कई लोगों का सपना होता है. बर्फ से ढकी चोटी, नीचे तैरते बादल और जीत का एहसास- सब कुछ बेहद रोमांचक लगता है, लेकिन इसी रोमांच के बीच एक ऐसी सीमा आती है, जहां इंसान का शरीर और दिमाग दोनों जवाब देने लगते हैं. सांसें भारी हो जाती हैं, कदम डगमगाने लगते हैं और सोचने की ताकत कम पड़ जाती है. इसी खतरनाक हिस्से को पर्वतारोही ‘डेथ जोन’ कहते हैं.
डेथ जोन
8,000 मीटर से ऊपर ऑक्सीजन इतनी कम होती है कि शरीर अनुकूलन नहीं कर पाता और धीरे-धीरे मरने लगता है, जिसे ‘डेथ जोन’ कहते हैं.
हाइपोक्सिया और ऑक्सीजन की कमी
शरीर को सामान्य कामकाज के लिए जितनी ऑक्सीजन चाहिए, वहां ऊंची चोटियों पर उपलब्ध नहीं होती. हवा में कम ऑक्सीजन के कारण फेफड़े शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं दे पाते, जिससे हाइपोक्सिया होता है और अंगों को नुकसान पहुँचता है. जिससे फेफड़ों/दिमाग में सूजन (HAPE/HACE) आ जाती है.
हाइपोथर्मिया और फ्रॉस्टबाइट
ऊंचे पहाड़ों पर बेहद कम तापमान (-49°F तक) होने से शरीर का तापमान गिरने लगता है. जिससे हाइपोथर्मिया हो जाता है और त्वचा जमने (फ्रॉस्टबाइट) से ऊतक नष्ट हो जाते हैं.
शारीरिक और मानसिक थकान
ऑक्सीजन की कमी से व्यक्ति को चक्कर आना, भ्रम होना, निर्णय लेने में गलती करना जैसी समस्याएं होने लगती हैं. कई मामलों में हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडेमा (HACE) हो सकता है. जिससे सोचने-समझने की क्षमता कम हो जाती है औऱ पर्वतारोही फैसले नहीं ले पाते जिसके बाद थकावट के कारण वहीं गिर जाते हैं.
अन्य कारण
फिसलकर गिरना, हिमस्खलन और दरारों में फंसना भी मौत के बड़े कारण हैं.
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