Religion: हिंदू धर्म में गोवत्स द्वादशी का विशेष धार्मिक महत्व है, यह पर्व दीपावली और धनतेरस से पहले मनाया जाता है, इसे वसु बारस, बछ बारस और नन्दिनी व्रत के नाम से भी जाना जाता है, इस दिन गाय और बछड़े की पूजा करने की परंपरा है, मान्यता है कि गोवत्स द्वादशी का व्रत रखने से संतान को सुख, समृद्धि और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। जानिए गोवत्स द्वादशी कब मनाई जाएगी और इसका शुभ मुहूर्त, पूजा विधि
कब है गोवत्स द्वादशी
पंचांग के मुताबिक, इस साल गोवत्स द्वादशी यानी वसु बारस का पर्व 5 नवंबर, गुरुवार को मनाया जाएगा, द्वादशी तिथि 5 नवंबर की सुबह 10 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 6 नवंबर की सुबह 10 बजकर 30 मिनट तक रहेगी, इस दिन व्रती महिलाएं संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना के साथ व्रत रखती हैं।
गोवत्स द्वादशी शुभ मुहूर्त
गोवत्स द्वादशी पर पूजा के लिए शाम का समय शुभ माना गया है, इस साल पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 33 मिनट से रात 8 बजकर 10 मिनट तक रहेगा, इस अवधि में श्रद्धालु विधि-विधान से गाय और बछड़े की पूजा कर सकते हैं।
गोवत्स द्वादशी की पूजा विधि
गोवत्स द्वादशी के दिन सुबह स्नान करने के बाद व्रती महिलाएं गाय माता और उनके बछड़े की पूजा का संकल्प लें। यदि घर में गाय और बछड़ा मौजूद हैं, तो उन्हें स्नान कराकर या साफ-सफाई करके उनका शृंगार करें, घर में गाय-बछड़ा न होने पर उनकी मूर्ति या चित्र स्थापित कर पूजा की जा सकती है।
गाय और बछड़े के माथे पर हल्दी और कुमकुम लगाएं, इसके बाद रोली, अक्षत, फल, मिष्ठान, नैवेद्य, दीप और धूप अर्पित करें। पूजा के बाद गाय और बछड़े को मीठा चारा, गुड़ और चना खिलाएं, दिनभर व्रत रखते हुए गाय की सेवा करें, शाम को दोबारा विधि-विधान से पूजा करें और गोवत्स द्वादशी की कथा का श्रवण करें, पूजा संपन्न होने के बाद व्रत का पारण करें।