Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि भगवान् श्री कृष्ण का प्राकट्य भाद्रमास, कृष्णपक्ष, अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, बुधवार आधी रात को हुआ। भगवान का प्राकट्य कंस के कारागार में हुआ। इसका आध्यात्मिक पक्ष यह है कि जन्म तो सबका ही कारागार में होता है। प्रत्येक जीव कर्म बन्धन में बंध करके जन्म लेता है।यहां कोई स्वतंत्रत नहीं है जैसा हमारा पूर्व कर्म है उसी के अनुसार हम सबको जन्म प्राप्त होता है।
भगवान का प्राकट्य भाद्रमास कृष्णपक्ष अष्टमी आधी रात को हुआ। इसका आशय है प्रत्येक व्यक्ति का जन्म घनघोर अंधकार में ही होता है। आध्यात्मिक दृष्टि से अंधकार का आशय ज्ञान का अभाव है। कोई भी जन्म से मुक्त नहीं होता और कोई भी जन्म से ज्ञानवान नहीं होता। जन्म तो सबका ही कारागार में, अंधकार में ही होता है। लेकिन जरूरी नहीं है कि हर कोई बंधन में ही रहे।संसार में कई लोग हैं जो सत्संग प्राप्त करके ज्ञानवान बन जाते हैं। उनके जीवन का अंधकार समाप्त हो जाता है और वे प्रकाशमय जीवन जीते हैं।
जीवन में निष्काम कर्मयोग का आश्रय ले करके सारे कर्तव्यों का पालन करते हुए भी, कर्म बंधन से मुक्त रहते हैं।जन्म भले कारागार में हुआ लेकिन जीवन मुक्त रहे। और आखरी में भी मुक्त ही रहे। किसी भी बंधन में नहीं बंधे। जीवन में भगवान की भक्ति करके ईश्वर की प्राप्ति किये, उनका जीवन सफल हो गया। भगवान् श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण आख्यान हम सबके लिये मार्गदर्शक है।
भगवान कृष्ण ने गीता का ज्ञान दे करके पूरे संसार मंगल किये। जीवन से अज्ञान रूपी अंधकार समाप्त करना है ज्ञान के माध्यम से, निष्काम कर्म योग से कर्म के बन्धन से रहित होना है। साथ में भगवत भक्ति से प्रभु को पाना है। यही हम सबके जीवन का लक्ष्य है।
भगवान प्रकट हो करके अपने माता-पिता को सम्पूर्ण कथा सुनाते हैं। पिछले जन्म में आप कश्यप अदिति थे।आपने कठिन तप किया। मैंने आपको वरदान दिया था मैं आपके यहां पुत्र बनकर आ गया। माता देवकी ने कहा प्रभु आपने पुत्र बनकर आने को कहा था लेकिन आप बड़े लम्बे चौड़े स्वरूप में आ गये। कल कौन कहेगा कि यह देवकी के लाल हैं। भगवान ने कहा माता जी आपके यहां कोई सन्तान का जन्म होता है और कंस मामा उसे मारने आ जाते हैं, तो मैं ऐसी तैयारी से आया हूं कि अगर वह आज आ जायें तो जो काम हमें ग्यारह वर्ष बाद करना है, वह आज ही कर दूंगा। माँ देवकी के कहने पर भगवान नन्हे बालक बनने का निर्णय लेते हैं।
भगवान श्री वासुदेव जी से कहते हैं कि आप हमें टोकरी में रखकर गोकुल, मां यशोदा के पास छोड़ कर आना। श्री वासुदेव जी महाराज कहते हैं प्रभु आप हमको इस सब झंझट में क्यों डालते हैं। आप जैसे मथुरा पधारे वैसे गोकुल भी चले जाओ। भगवान ने कहा नहीं, आपको मुझे पहुंचना होगा। जीव कुछ करना नहीं चाहता है। जीव चाहता है सब कुछ भगवान कर दें लेकिन इस चरित्र से भगवान हम आपको शिक्षा देते हैं कि- हे जीव कर्म तो तुम्हें ही करना होगा। अगर तुमने सही-सही काम किया तो उसका फल मेरे द्वारा अच्छा ही प्राप्त होगा।
सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).