Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने के पूर्व विघ्ननिवारणार्थ एवं कार्य सिद्धयर्थ श्री गणेश जी की आराधना आवश्यक है।योगशास्त्र के आचार्यों का कहना है कि मेरुदण्ड के मध्य में जो सुषुम्ना नाड़ी है।वह ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश करके मस्तिष्क के नाड़ी गुच्छ से मिल जाती है। साधारण दशा में प्राणी सम्पूर्ण शरीर में बिखरा रहता है। उसके साथ चित्त भी चंचल रहता है।
योगी क्रिया विशेष से प्राण को सुषुम्ना में खींचकर ज्यों-ज्यों ऊपर चढ़ाता है।त्यों-त्यों उसका चित्त शान्त होता है। सुषुम्ना में नीचे से ऊपर तक नाड़ी कन्द या नाड़ियों के गुच्छे होते हैं। इन्हें क्रमशः मूलाधार,स्वाधिष्ठान,मणिपूरक,अनाहत,विशुद्ध औरआज्ञाचक्र कहते हैं। इस मूलाधार को गणेश स्थान भी कहा जाता है। कबीर आदि ने जहां चक्रों का वर्णन किया है। वहां प्रथम स्थान को गणेश स्थान ही कहा है।गणेश तत्व का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?
गोस्वामी श्री तुलसीदास जी महाराज ने अपनी रामायण में भगवती पार्वती को श्रद्धा और भगवान शिव को विश्वास का रूप माना है।किसी कार्य की सिद्धि के लिये श्रद्धा विश्वास दोनों का ही होना आवश्यक है। जब तक श्रद्धा न होगी तब तक विश्वास नहीं हो सकता। तथा विश्वास के अभाव में श्रद्धा भी नहीं ठहर पाती। वैसे ही पार्वती और शिव से गणेश जी हुए। अतः गणेश और अभीष्ट पूर्ति के प्रतीक हुए।’ बाला पद्धति ‘ में इन छः चक्रों के देवताओं के नाम दिये गये हैं।गणेश्वरो विधिर्विष्णुः शिवो जीवो गुरुस्तथा।षडेते हंसतामेत्य मूलाधारादिषु स्थिताः।।गणेश, ब्रह्मा, विष्णु ,शिव, जीव और गुरु ये हंस भाव को प्राप्त होकर क्रमशः मूलाधार आदि चक्रों में स्थित है।
सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).