Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि द्वितीय स्कन्ध में श्री शुकदेवजी के द्वारा त्रिधा भक्ति का उपदेश किया गया। हम बहुत कुछ न कर पावे तो तीन काम कर लें। श्रवण, कीर्तन और मनन। कानों से भगवान की कथा श्रवण करना, वाणी से भगवान का कीर्तन करना और मन से भगवान की लीलाओं का मनन करना, इसको भागवत में त्रिधा भक्ति बताया गया है।
श्रीमद् भागवत में नवधा भक्ति, त्रिधा भक्ति और एकधा भक्ति का निरूपण किया गया है। अगर हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते तो केवल भगवान का कथा कीर्तन श्रवण करें। श्रवण करने से कीर्तन, मनन और बाकी की भक्ति स्वत: हो जायेगी। इसीलिए श्रवण भक्ति को प्रथम और सर्वोपरि बताया गया है।
हम आपके जीवन में जितना भी ज्ञान है वह सब सुनकर हुआ है। किसी ने कहा हमने सुना। दिखने वाले संसार का ज्ञान बिना सुने नहीं हो सकता, तो न दिखने वाले धर्म और ईश्वर का ज्ञान बिना सुने हो जायेगा। कदापि नहीं। इसलिए अध्यात्म क्षेत्र में श्रवण सर्वोपरि बताया गया।
चतु:श्लोकी भागवत भगवान नारायण ने ब्रह्मा जी को सुनाया। ब्रह्मा जी ने यह ज्ञान अपने पुत्र देवर्षि नारद को दिया, तब चार ही मंत्र थे। श्री नारद जी ने अपने शिष्य भगवान व्यास को शम्याप्राश में वही उपदेश दिया। तब भी भागवत में चार ही मंत्र थे। देवर्षि नारद की आज्ञा से भगवान व्यास ने चार मंत्रों का विस्तार करके अठारह हजार मंत्रों वाले श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना किया। प्रारम्भ के तीन मंत्रों में ब्रह्म, जीव, माया का वर्णन किया गया है। और चतुर्थ मंत्र में ब्रह्म की व्यापकता का वर्णन किया गया है।
सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).