Human species: मृत्यु एक ऐसी सच्चाई है, जो हमें डराती भी है और नए रहस्यों कि खोज में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देती है। हालांकि, आज का आधुनिक विज्ञान एक ऐसी दिशा में आगे बढ़ रहा है, जो हमें शायद भविष्य में अमर बना दे। ऐसे में कई सवाल उठते हैं आखिर अमरता है क्या? उस समाज की संरचना कैसी होगी जहां पर कोई व्यक्ति प्राकृतिक तौर पर मरता नहीं है? उस समाज की अर्थव्यवस्था का रूप कैसा होगा? वहां रिश्ते और सम्बन्ध किन आधारों पर टिके होंगे?
अगर मौत न हो तो?
प्रकृति का नियम है कि पुरानी पीढ़ी जाती है और नई आती है। इसी प्रक्रिया को इवोल्यूशन कहते हैं। नई पीढ़ी में जीन का मिश्रण होता है, जिससे बेहतर गुण आगे बढ़ते हैं। अगर मौत खत्म हो जाए, तो कमजोर या दोषपूर्ण जीन भी बने रहेंगे। इससे पूरी मानव प्रजाति धीरे-धीरे जैविक रूप से कमजोर हो सकती है। यानी अमरता विकास की प्रक्रिया को रोक सकती है।
हार्मोन और मानसिक प्रभाव
हमारे शरीर के हार्मोन समय की भावना से जुड़े हैं। उम्र के साथ लक्ष्य बदलते हैं, सोच बदलती है। सीमित जीवन हमें फैसले लेने के लिए प्रेरित करता है। अगर जीवन का अंत ही न हो, तो समय का दबाव खत्म हो जाएगा। अभी की अहमियत कम हो सकती है। प्रेरणा घट सकती है। मानसिक ठहराव बढ़ सकता है। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि सीमित जीवन ही जीवन को अर्थ देता है। अगर अंत न हो, तो शुरुआत का महत्व भी कम हो सकता है।
क्या मौत जरूरी है?
मौत को अक्सर डर के रूप में देखा जाता है, लेकिन बायोलॉजी में यह जीवन चक्र का हिस्सा है। यह शरीर की गलतियों को आगे बढ़ने से रोकती है। नई पीढ़ी को जगह देती है। संतुलन बनाए रखती है। इसीलिए अब तक के वैज्ञानिक शोध यही बताते हैं कि इंसान का शरीर अमर बनने के लिए डिजाइन नहीं हुआ है। उम्र बढ़ना और मृत्यु प्रकृति की योजना का हिस्सा हैं।
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