Desert fire hole: पृथ्वी पर एक ऐसी जगह है जिसे “नरक का दरवाजा” कहा जाता है, और इस स्थान की कहानी सुनकर आपकी आंखें चौंधिया जाएंगी. यह स्थान तुर्कमेनिस्तान की राजधानी अश्गाबात से लगभग 260 किलोमीटर उत्तर में स्थित रेगिस्तान में है. यह गड्ढा पिछले 53 वर्षों से लगातार जल रहा है, और यही वजह है कि इसे ‘नरक के दरवाजे’ के नाम से जाना जाता है. इस गड्ढे का तापमान 1000 डिग्री सेल्सियस तक होता है.
काराकुम रेगिस्तान का खौफनाक दरवाजा
तुर्कमेनिस्तान की रेगिस्तान में मीथेन और आग से भरा 229 फीट चौड़ा और तकरीबन 65 फीट गहरा गड्ढा है. माना जाता है कि साल 1971 में सोवियत संघ के वैज्ञानिकों की ड्रिलिंग की वजह से यहां आग लगी थी. उसी समय यानी बीते 53 साल से यह आग लगातार जलती जा रही है. इसके अंदर का तापमान लगभग 1000 डिग्री सेल्सियस तक रहता है. गैस की निरंतर आपूर्ति ने इस गड्ढे को एक कभी न खत्म होने वाली भट्ठी में तब्दील कर दिया है.
सोवियत वैज्ञानिकों की ड्रिलिंग और वो बड़ी चूक
इस आग की शुरुआत साल 1971 में हुई थी, जब तुर्कमेनिस्तान सोवियत संघ का हिस्सा था. उस दौरान सोवियत वैज्ञानिक तेल और गैस की खोज में रेगिस्तान की खुदाई कर रहे थे. अचानक उनकी ड्रिलिंग मशीन एक विशाल गैस भंडार में जा घुसी, जिससे वहां की जमीन धंस गई और एक बड़ा गड्ढा बन गया. वैज्ञानिकों ने देखा कि इस गड्ढे से भारी मात्रा में जहरीली मीथेन गैस निकल रही है. उस समय उन्हें लगा कि अगर गैस यूं ही निकलती रही, तो पर्यावरण और आसपास के इलाकों को बड़ा नुकसान होगा.
एक ऐसी आग जो बुझाने से भी नहीं बुझी
मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है और उस वक्त के वैज्ञानिकों ने सोचा कि सबसे अच्छा तरीका इसे जला देना है. उन्होंने अनुमान लगाया था कि गड्ढे में आग लगाने के कुछ हफ्तों बाद जब सारी मीथेन गैस जलकर खत्म हो जाएगी, तो आग अपने आप बुझ जाएगी, लेकिन वैज्ञानिकों का यह अंदाजा पूरी तरह गलत साबित हुआ. काराकुम रेगिस्तान के नीचे मौजूद गैस का भंडार इतना विशाल था कि वह आग आज 53 साल बीत जाने के बाद भी उसी तीव्रता से जल रही है.
अब दूर-दूर से देखने आते हैं लोग
इस बीच ‘नरक का दरवाजा’ तुर्कमेनिस्तान का सबसे बड़ा टूरिस्ट आकर्षण बन गया. दूर से रात में यह ऐसा दिखता है मानो धरती के बीचोंबीच कोई विशाल ज्वालामुखी फट रहा हो. पहले जहां इसकी लपटें कई किलोमीटर दूर से नजर आती थीं, अब केवल हल्की सी लौ ही बाकी बची है.
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