सुहागिन महिलाओं के लिए शुभ है मंगला गौरी का व्रत, जानें पूजा व्रत की विधि

Religion: सावन माह के मंगलवार को रखा जाने वाला मंगला गौरी व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए शुभ है। मां पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप को समर्पित इस व्रत में महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। इस व्रत की शुरुआत के बाद कब तक ये परंपरा निभाएं। जानिए मंगला गौरी व्रत कितने साल तक करना चाहिए। 

कितने साल रखें मंगला गौरी व्रत

मान्याताओं के अनुसार यह व्रत विवाह के बाद महिलाएं लगातार 5 वर्षों तक सावन के प्रत्येक मंगलवार को रखती हैं। पांचवें साल सावन के अंतिम मंगलवार को पूजा और हवन के साथ व्रत का उद्यापन करने की परंपरा है। बता दे कि  अलग-अलग क्षेत्रों में व्रत की अवधि को लेकर कुछ अंतर देखने को मिलता है। कुछ परिवारों में महिलाएं 7 वर्षों तक भी यह व्रत करती हैं। 

अविवाहित कन्याएं भी रख सकती है मंगला गौरी का व्रत

मान्यता यह भी है कि अविवाहित लड़कियां भी अच्छे वर और मनचाहे जीवनसाथी की कामना से मंगला गौरी व्रत कर सकती हैं। वे अपनी श्रद्धा के अनुसार इस व्रत की अवधि का संकल्प रख सकती हैं। वहीं, कुछ परंपराओं में विवाह होने तक इसे करने का उल्लेख मिलता है।

मंगला गौरी के व्रत में ऐसे करें पूजा

व्रत वाले दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा का संकल्प लें। पूजा स्थल पर चौकी रखकर लाल और सफेद कपड़ा बिछाएं। सफेद कपड़े पर चावल से नवग्रह और लाल कपड़े पर गेहूं से सोलह माताओं की आकृति बनाएं। इसके बाद गणेश जी की स्थापना करें और दूसरी ओर जल से भरा कलश रखें। आटे से बने चौमुखी दीपक में चार बत्तियां जलाएं।

सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करें। उन्हें जल, रोली, मौली, चंदन, सिंदूर, अक्षत, फूल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, फल, मेवे और दक्षिणा अर्पित करें। इसके बाद कलश, नवग्रह और सोलह माताओं का पूजन करें। फिर माता मंगला गौरी की प्रतिमा को जल, दूध और दही से स्नान कराकर वस्त्र पहनाएं। माता को रोली, चंदन, सिंदूर, मेहंदी, काजल और सोलह श्रृगार की सामग्री अर्पित करें। फूल माला, फल, मेवे और सुपारी भी चढ़ाएं।

अब मंगला गौरी व्रत की कथा सुनें और आरती करें। विवाहित महिलाएं अपनी सास और ननद को 16 लड्डू देने की परंपरा निभाती हैं। ब्राह्मण को भी प्रसाद और पूजन सामग्री देने का विधान है। अंतिम व्रत के दूसरे दिन देवी मंगला गौरी की प्रतिमा पूरे विधि-विधान और नियमों के साथ नदी में विसर्जित कर दी जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *